भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी

प्रेस विज्ञप्ति

20 मई 2012

बस्तर में भारतीय सेना का प्रशिक्षण बंद करो!

सैन्य बलों को वापस भेजो!

देश की जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - आपरेशन ग्रीन हंट रोको!

समूचे दण्डकारण्य में 1 से 7 जून तक विरोध सप्ताह

तथा 7 जून को दण्डकारण्य बंद सफल बनाओ!

पिछले ढाई सालों से देश की जनता पर, बेहद दबी-कुचली जनता पर शोषक शासक वर्गों ने एक युद्ध छेड़ रखा है। इसे कभी आपरेशन ग्रीनहंट के नाम से पुकारा जाता है तो कभी इससे इनकार भी किया जाता है। यह एक देशव्यापी युद्ध है जिसका मकसद है माओवादी आंदोलन का उन्मूलन। क्योंकि शासक वर्गों का कहना है कि माओवादी आंदोलन देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। दरअसल यह एक जुमला युद्ध की घोषणा ही है। यह अब किसी से छिपी हुई बात नहीं रह गई कि माओवादी आंदोलन उन जगहों में सबसे ज्यादा मजबूत है या यूं कहें कि माओवादी आंदोलन में वो लोग शामिल हैं जो बेहद शोषित उत्पीडि़त हैं। वो आज अपने पैरों की नीचे की जमीन को, अपने जंगल-पहाड़ों को और नदी-नालों को बचाने के लिए जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं। विडम्बना है कि तथाकथित आजादी को आए हुए 64 साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी जनता को जमीन मिलना तो दूर, अपनी रही-सही जमीनों को बचाने के लिए भी जान को दांव पर रखकर लड़ना पड़ रहा है। शासकों के नजरिए से जल-जंगल-जमीन को बचाना या बचाने के लिए लड़ना आज आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे का मुद्दा बन गया।

इस बहाने आज खासकर छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, ओडि़शा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि राज्यों में सरकारी सशस्त्र बलों द्वारा जनता का, खासकर आदिवासियों का कत्लेआम किया जा रहा है। पिछले ढाई सालों में सिर्फ दण्डकारण्य में 250 से ज्यादा आदिवासियों की निर्मम हत्या की गई। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश भर में यह संख्या कितनी अधिक होगी। महिलाओं के साथ बलात्कार एक आम बात बन गया। घर जलाए जा रहे हैं। गांव उजाड़े जा रहे हैं। लोगों को मारा जा रहा है। खदेड़ा जा रहा है। पकड़कर जेलों में बंद किया जा रहा है। फर्जी मुकदमों में फंसाकर सालों साल बिना सुनवाई या जमानत के सड़ाया जा रहा है। कठोर सजाएं दी जा रही हैं। तथाकथित कानून देश की निर्धनतम जनता के लिए दमन के एक और औजार से ज्यादा कुछ नहीं रहा, यह बात जब दिन के उजाले की तरह साफ होने लगी तो जनता को अपहरण जैसी कार्रवाइयों पर उतारू होना पड़ रहा है।

इस नाजायज युद्ध में पिछले एक साल से सेना को लगाया गया है। जिसे विदेशी दुश्मनों के संभावित हमलों से देश को बचाने के लिए सरहदों पर मोर्चा संभालना चाहिए था, उसे देश के बीचोबीच दुश्मनों से लड़ने के लिए तैनात किया गया है। हालांकि इसे तैनाती कहकर प्रशिक्षण के बहाने एक ब्रिगेड की संख्या में सेना को यहां लाया गया है। यानी शासकों को यकीन है कि देश की जनता इतनी बेवकूफ है कि इसे सच मान ले। वास्तव में क्रांतिकारी आंदोलन के दमन में सेना की भूमिका करीब 7-8 सालों से देखी जा सकती है। इतना ही नहीं, आत्मरक्षा के नाम पर सेना को कई अधिकार दिए जा चुके हैं जो क्रूर कानून एएफएसपीए (सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून) के तहत आते हैं। वायुसेना के हेलिकाप्टरों का प्रयोग अरसा पहले से जारी है। अब इसके एअरबेस बनाए जा रहे हैं। सेना की छत्तीसगढ़-ओडि़शा सब-एरिया कमान का मुख्यालय रायपुर में खोला गया। बिलासपुर के निकट सेना का कंटोन्मेंट बन रहा है। सेना की भर्ती की प्रक्रिया लगातार चल रही है। कुल मिलाकर कहा जाए तो बहुत जल्द भारत सरकार की सेना जनता पर युद्ध में सक्रिय भूमिका लेने जा रही है। इससे यहां की जनता पर जारी दमनचक्र किस हद तक बढ़ सकता है, इसकी अब तो कल्पना ही की जा सकती है।

आखिर इस युद्ध के लिए इतना उतावलापन क्यों? क्योंकि देश की तमाम आदिवासी इलाकों की तरह दण्डकारण्य भी अनमोल प्राकृतिक सम्पदाओं का खजाना है। इसे लूटने के लिए दलाल नौकरशाह पूंजीपतियों और साम्राज्यवादियों की कार्पोरेट कम्पनियों ने एड़ी-चोटी एक की हुई हैं। 2008 से छाई हुई वैश्विक मंदी की पृष्ठभूमि में वो और ज्यादा आक्रामकता के साथ हमारे देश की प्राकृतिक सम्पदाओं को लूटने-खसोटने की कोशिशें कर रही हैं। टाटा, एस्सार, जिंदल, मित्तल, वेदांता, जयस्वाल्स नेको आदि कार्पोरेट कम्पनियां इन इलाकों में तेजी से घुसपैठ कर रही हैं। हमारे देश के दलाल शासक उनके सामने घुटने टेके हुए हैं। करोड़ों की दलाली के एवज में देश की सम्पदाओं को क्या, सार्वभौमिकता तक को गिरवी रखने से उन्हें परहेज नहीं है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों समेत सभी मंत्री-नेता इस लूटकाण्ड में अपना हिस्सा हथियाने को आतुर हैं। लेकिन जनता इसका विरोध कर रही है। क्योंकि इस लूट-खसोट को छूट देने का मतलब है जल-जंगल-जमीन का विनाश और करोड़ों लोगों का विस्थापन। एक शब्द में जनता की मुकम्मल तबाही। जनता के प्रतिरोधी संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में खड़ी है भाकपा (माओवादी) इसकी बदौलत आज लाखों करोड़ रुपए के एमओयू पर काम नहीं चल पा रहा है जिससे कार्पोरेट घराने, उनके आका साम्राज्यवादी, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादी बौखलाए हुए हैं। क्योंकि कई जगहों पर खदानें शुरू नहीं हो पा रही हैं। खदान माफिया को मार भगाया जा रहा है। कई भारी उद्योग खुल नहीं पा रहे हैं। कई भारी बांधों के निर्माण पर रोक लग चुकी है।

लुटेरे शासक वर्ग अपनी लूटखोर नीतियों पर विकास का चोला ओढ़कर अपने कार्पोरेट मीडिया के जरिए बड़े पैमाने पर दुष्प्रचार मुहिम चला रहे हैं। दूसरी ओर माओवादियों को आतंकवादी और विकास विरोधी कहकर अपने अमानवीय युद्ध को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी पार्टी के नेतृत्व में दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड समेत देश के विभिन्न इलाकों में जनता द्वारा बुनियादी स्तर पर निर्मित हो रही जनता की जनवादी राजसत्ता के अंगों से भी शोषक लुटेरे पगलाए हुए हैं। ग्रामीण इलाकों में सामंती अन्य प्रतिक्रियावादी ताकतों की सत्ता को ध्वस्त कर शोषित जनता द्वारा खड़ी की जा रही क्रांतिकारी जनताना सरकार या क्रांतिकारी जन कमेटी से वर्तमान सामंती दलाल पूंजीपतियों की राजसत्ता को सीधी चुनौती मिल रही है। जनता द्वारा सामने लाए जा रहे विकास के वैकल्पिक नमूने से साम्राज्यवाद-प्रायोजित ढोंगी विकास के नमूने को टक्कर मिल रही है।

यही वजह है कि माओवादी आंदोलन देश के शासक वर्गों तथा उनके आका साम्राज्यवादियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया। यही वजह है कि इसका सफाया करने के लिए यह युद्ध छेड़ दिया गया। अब इस युद्ध ने काफी हिंसात्मक और भयावह रूप धारण कर लिया है। 3 से 5 हजार की संख्या में राज्य पुलिस, सीआरपीएफ-कोबरा, कमाण्डो और कोया कमाण्डो को लेकर सेना की तर्ज पर भारी आक्रमण किए जा रहे हैं। ये आने वाले दिनों में सेना की प्रत्यक्ष आपरेशनों के लिए पूर्वाभ्यास हैं। अक्टूबर 2011 में गढ़चिरोली जिले के धनोरा तहसील में, 24 से 27 नवम्बर 2011 में बस्तर के बीजापुर क्षेत्र में चलाए गए आपरेशन्स तथा 19 दिसम्बर 2011 को दक्षिण बस्तर क्षेत्र के केडवाल गांव पर हेलिकाप्टरों के जरिए किए गए भारी हमले में हजारों सशस्त्र बलों का इस्तेमाल किया गया। फिर 2012 में फरवरी महीने के आखिर में बीजापुर जिले के गंगलूर क्षेत्र में और मार्च में माड़ क्षेत्र पर चलाए गए अपरेशन विजय आपरेशन हाका भी इसी श्रेणी में आते हैं जिनमें एक ब्रिगेड की संख्या में सशस्त्र बलों को लगाया गया। जाहिर है इन तमाम आपरेशनों के दौरान जनता पर अमानवीय हिंसा, तबाही, हत्या, महिलाओं पर यौन अत्याचार के अलावा व्यापक गिरफ्तारियां हुईं।

आपरेशन ग्रीन हंट या जनता पर युद्ध सिर्फ माओवादी संघर्ष के इलाकों तक सीमित नहीं है। यह देश की समूची जनता पर युद्ध है। देश की तमाम प्राकृतिक सम्पदाओं और संसाधनों की लूट का रास्ता साफ करना तथा एक विकल्प के रूप में पनप रही जनता की जनवादी राजसत्ता का गला दबाना ही इस युद्ध का मकसद है। कार्पोरेट लूट के रास्ते में बाधा खड़ी करने वाले हर व्यक्ति या हर संगठन को यह राजसत्ता अपना दुश्मन मानती है। इसलिए इस युद्ध को रोकना है। इसमें सेना की तैनाती को रोकना है। ऐसा हम कर सकते भी हैं।

तो आइए, आगामी 1 से 7 जून 2012 तक समूचे दण्डकारण्य में विरोध सप्ताह मनाएं। देश की जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - आपरेशन ग्रीनहंट को बंद करने तथा बस्तर में सेना का प्रशिक्षण समाप्त कर उसे यहां से वापस लेने की मांगों के साथ जगह-जगह धरना, प्रदर्शन, जुलूस, सभा, चक्काजाम आदि कार्यक्रमों को सफल बनाएं। 7 जून को 24 घण्टे का दण्डकारण्य बंद सफल बनाएं।

(गुड्सा उसेण्डी)

प्रवक्ता,

दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)