भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी

प्रेस विज्ञप्ति

1 मार्च 2012

सिविक एक्शन प्रोग्राम एक ढोंग है!

हत्यारे बलों का फेंक दो सामान

बहिष्कार का कर दो ऐलान

खासकर पिछले दो सालों से सरकारी सशस्त्र बलों द्वारा आयोजित सिविक एक्शन प्रोग्राम अखबारों की सुर्खियां बटोर रहा है। जिन पुलिस अर्धसैनिक बलों के हाथ सैकड़ों निहत्थे आदिवासियों के खून से सने हैं, जिनके हाथ बच्चे-बूढ़े या महिला-पुरुष का फर्क किए बगैर बेरहमी से लाठियां बरसाने के लिए कुख्यात हैं वो आजकल जगह-जगह तम्बू गाड़कर सिविक एक्शन प्रोग्राम का बैनर लगाकर लोगों को मुफ्त में छोटा-मोटा सामान बांटने का काम भी कर रहे हैं। आदिवासियों के घरों को जलाने, फसलों अनाज को तबाह करने, महिलाओं के साथ अपमान करने के लिए बदनाम हाथों से अब कम्बल, बरतन, साइकल, खेलकूद का सामान, स्कूली बच्चों को बैग, किताब, पेंसिल आदि सामान भी बंट रहा है। बीमार लोगों का इलाज करने दवाइयां बांटने का ढोंग भी जारी है। गश्त तलाशी अभियानों के नाम से गांवों पर हमले करके किसी को भी गोलियों से भून डालकर उसे मुठभेड़ बता मृतक को इनामी नक्सली घोषित करने वाले लाइसेंसी हत्यारे अब सद्भावना का ढिंढ़ोरा भी पीट रहे हैं।

आखिर यह नौटंकी किस लिए?

हम सबको पता है कि दण्डकारण्य, यानी अविभाजित बस्तर और गढ़चिरोली क्षेत्रों में पिछले 30 साल से क्रांतिकारी आंदोलन जारी है। यह आंदोलन नव जनवादी क्रांति के लक्ष्य से जल, जंगल और जमीन पर जनता के अधिकार के मुद्दों को लेकर शोषण, उत्पीड़न दमन के खिलाफ शुरू हुआ। इस लड़ाई की बदौलत आज जनता गांव-गांव में अपनी ही सरकार - क्रांतिकारी जनताना सरकार की स्थापना कर अपने विकास का रास्ता खुद तय कर रही है। वन विभाग, राजस्व विभाग, ठेकेदार, पेपर मिल मालिक तथा गांवों पर राज करने वाले सामंती तत्वों के शोषण उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष चलाया गया। उनके जुल्मों को खत्म किया गया। उनकी लूटखसोट पर अंकुश लगाया गया। लेकिन खुद को लोकतंत्र बताने वाली राजसत्ता हमेशा इन संघर्षों का पुलिस अर्धसैनिक बलों के जरिए दमन ही करती रही। आज तो पूरे देश में माओवादी आंदोलन को खत्म करने के नाम पर एक देशव्यापी दमनात्मक युद्ध चलाया जा रहा है जिसे आपरेशन ग्रीनहंट कहा जा रहा है। यह दरअसल जनता पर युद्ध है जिसका असली मकसद है देश की तमाम प्राकृतिक सम्पदाओं को बड़े विदेशी पूंजीपतियों के हवाले किया जाए और इस राह में मौजूद तमाम बाधाओं को हटा लिया जाए। इसी नाजायज युद्ध के तहत दूर-दराज के गांवों में नए-नए पुलिस कैम्प थाने खोल दिए गए। पूरे दण्डकारण्य में तैनात पुलिस, अर्धसैनिक और अन्य तमाम सशस्त्र बलों की संख्या 60 हजार से ऊपर है। राज्यों के पुलिस विशेष सशस्त्र बलों, के अलावा सी-60 कमाण्डो, एसटीएफ, सीआरपीएफ, कोबरा, बीएसएफ, आइटीबीपी, एसएसबी, आइआरबी - हर किस्म की फोर्स यहां पर उतार दी गई है। अब प्रशिक्षण के नाम से सेना के एक ब्रिगेड को यहां पर तैनात किया गया है जिससे इस नाजायज युद्ध में उसे प्रत्यक्ष रूप से मोर्चे पर लगाने की आशंका सच में बदलती नजर रही है।

इस अन्यायपूर्ण युद्ध के साथ-साथ विकास का ढोंगी नारा भी शोषक-लुटेरे लगा रहे हैं। इसके लिए अलग-अलग पैकेजों और योजनाओं में हजारों करोड़ रुपयों का आवंटन किया जा रहा है। इसके पीछे साजिश यह है कि आदिवासी इलाकों में विकास की योजनाओं को लागू कर उन्हें माओवादी संघर्ष में शामिल होने से रोका जाए। शोषक शासक चाह रहे हैं कि इस तरह जनता में से एक बड़े तबके को झूठे विकास की योजनाओं के चक्कर में फंसाकर जनता में फूट डाली जाए। जनता की एकजुटता को तोड़कर ही यहां के जल-जंगल-जमीन को हड़पकर उस पर बड़े दलाल पूंजीपतियों और साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा बनाने का उनका मूल मकसद पूरा हो सकता है।

सरकारों की ढोंगी सुधार योजनाओं के तहत ही पुलिस अर्धसैनिक बल सिविक एक्शन प्रोग्राम के नाम से कुछ पैसे खर्च कर लोगों को सामान बांट रहे हैं। जितना बांट रहे हैं उससे कई गुना ज्यादा प्रचार अखबारों के जरिए करवा रहे हैं। इस तरह वे जनता में से कुछ लोगों को अपना मुखबिर या दलाल बनाकर उनसे क्रांतिकारी आंदोलन संगठन सम्बन्धी जानकारियां हासिल करना चाह रहे हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि सिर्फ लाठियों और गोलियों से किसी जायज आंदोलन को कुचलना संभव नहीं है। उनके जुल्मखोर सलवा जुडूम अभियान की क्या दुर्गति हुई थी, इसका भी उन्हें अंदाजा है। यही वजह है कि वे अब जनता के हितैषी होने का ढोंग रच रहे हैं ताकि लोगों को भ्रम में डालकर चंद लोगों को अपनी तरफ रिझाया जा सके।

दण्डकारण्य के इतिहास पर नजर डाली जाए तो हमें मालूम पड़ता है कि हमारी जिंदगियां संघर्ष या बगावत से हमेशा जुड़ी रहीं। शोषण, उत्पीड़न, भेदभाव, अत्याचार अपमान के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा उठाकर पहले अंग्रेजों और 1947 की झूठी आजादी के बाद से देसी शोषक शासकों के खिलाफ दण्डकारण्य की जनता ने कई संघर्ष किए और काफी खून बहाया। हमारी जिंदगी में आज तक जो भी बदलाव आया वो सिर्फ और सिर्फ संघर्ष बलिदान के बल बूते पर आया। शोषक सरकारों की सुधार योजनाओं से और उनके भाड़े के सशस्त्र बलों के सिविक एक्शन प्रोग्राम से हमारे जीवन में कभी कोई बुनियादी बदलाव आया, आएगा। हमारी मूलभूत समस्याओं का समाधान इस व्यवस्था को जड़ से बदलने के मुद्दे से जुड़ा हुआ है। जूठन के चंद टुकड़े फेंककर हमें खरीद लेने का जो सपना लुटेरे शासक देख रहे हैं, वह आखिरकार दिवास्वप्न ही साबित होगा।

इसलिए हमें भाड़े के सशस्त्र बलों द्वारा आयोजित सिविक एक्शन प्रोग्राम का बहिष्कार करना चाहिए। कम्बल, साइकल, बरतन आदि सामान जो भी हमें देने की कोशिश वो करेंगे, उन्हीं के मुंह पर पटक देना चाहिए। हमें स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि यह सारा षड़यंत्र हमें हमेशा के लिए गुलामी के बंधनों में जकड़कर रखने का है। यहां लोहण्डीगुड़ा, धुरली-भांसी, चारगांव, बोधघाट, रावघाट, आमदायमेट्टा, कुव्वेमारी, बुधियारीमाड़, सूर्जागढ़ आदि जगहों पर अगर लुटेरी कम्पनियां आज भी हमारे जल-जंगल-जमीन पर डाका नहीं डाल पा रही हैं तो उसका कारण भाकपा (माओवादी) के नेतृत्व में एकजुट हुई जनता का संघर्ष ही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो हाथ आज हमें कम्बल, बरतन, बक्सा, बैग बांट रहे हैं वो दरअसल यहां की जमीन खनिज सम्पदा को लूटने पर आमादा हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जो आज हमें दवाइयां बांट रहे हैं वो दरअसल दलाल पूंजीपतियों और विदेशी कम्पनियों के साथ किए गए तरह-तरह के समझौतों के तहत हमें अपनी जमीनों जंगलों से बेदखल करने पर उतारू हैं। उनके हाथों से सामान लेने का मतलब है अपने स्वाभिमान को खुद ही ठेस पहुंचाना। उनके सामने हाथ फैलाने का मतलब है लाखों जनता के वीरतापूर्ण संघर्षों और प्रेरणादायक बलिदानों का अपमान करना।

.........तो आइए!

इनके षड़यंत्रों को कर दो परास्त! इनकी चालों को दे दो शिकस्त!!

लगाओ नारा सिविक एक्शन प्रेग्राम के बहिष्कार का!

(गुड्सा उसेण्डी)

प्रवक्ता,

दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)